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साथी-संगम

Friday, October 26, 2012

कविता: ‘प्रेम-पत्र’

प्रिय मित्रो, 
      सृजन के किन्हीं भावुक पलों में हृदय छलक पड़ा...मैंने कुछ बूँदें काग़ज़ पर बटोर लीं...बाद में देखा तो इनमें कुछ बिम्बों...कुछ प्रतीकों...कुछ पौराणिक प्रसंगों...के अनेक सुचीह्ने अवयव दिखायी पड़े...! ...एक बात यह भी कि...‘मुक्तछंद’ होकर भी इस काव्याभिव्यक्ति का अपना एक व्यवस्थित शिल्प है...मेरा यथासंभव प्रयास रहा है कि...यह कविता ‘मुक्तछंद/छंदमुक्त’ के नाम पर प्रचलित ‘अधिकांश’ रचनाओं की तरह एक ‘कवितानुमा शब्द-संयोजन’...अथवा एक ‘बेतरतीब पेशकश’...या यूँ कहें कि...एक ‘अराजक काव्याभिव्यक्ति’ बनकर न रह जाय। मेरा प्रयास कितना सफल रहा, यह तो आप सभी पाठकगण बताएँगे...! बहरहाल...मेरे मन मे आया कि मैं इसे ‘जौहरवाणी’ के माध्यम से आप तक पहुँचाऊँ...! सो प्रस्तुत है- 

 प्रेम-पत्र 

आपका प्रेम-पत्र...
जैसे किसी वैभवशाली ‘अभाव-महल’ में
आकुल-व्याकुल
उर्मिला के समक्ष
किसी लक्ष्मण का
भावमय गृह-आगमन !
  •  
आपका प्रेम-पत्र...
जैसे किसी विस्मरण-गुहा में
उपेक्षित-तिरस्कृत
दमयन्ती के गिर्द
किसी निष्‍ठुर ‘नल’ की
सहृदय वापसी !
आपका प्रेम-पत्र...
जैसे किसी उत्तप्‍त मरुस्थल में
तृषावंत-क्लांत
मृग के सम्मुख
सहसा किसी नखलिस्तान का
आह्लादक प्राकट्य !
आपका प्रेम-पत्र...
जैसे किसी निर्जन-निर्तृण वनप्रांतर में
शाप-तापग्रस्त
प्रस्तर-शिला के शीश पर
किसी विरल बादल की
जीवन-जलवर्षा !

____________________________
- जितेन्द्र ‘जौहर’
पत्राचार:  IR-13/3, रेणुसागर, सोनभद्र (उप्र) 231218.
कार्यस्थल: अंग्रेज़ी विभाग, ए.बी.आई. कॉलेज।
मोबा. +91 9450320472
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टिप्पणियाँ:  ‘फ़ेसबुक वॉल’ से... (जस-की-तस; Copy & Paste)-

Saturday, September 22, 2012

मुक्तक : कुछ विचार, कुछ प्रकार

प्रिय मित्रो,
निम्नांकित आलेख मैंने प्रसिद्ध त्रैमा. ‘शब्द प्रवाह’ (उज्जैन) के ‘मुक्तक विशेषांक’ (अंक-15, अप्रैल-जून ’12) के लिए...तमाम व्यस्तताओं के बीच... बहुत जल्दबाज़ी में लिखा था...देश के विभिन्न हिस्सों में जहाँ-जहाँ यह पत्रिका गयी... इसे पाठकों का भरपूर प्यार मिला। इस आलेख का परिवर्द्धित संस्करण ‘नई ग़ज़ल’ (शिवपुरी, म.प्र)  के अंक जुलाई-सितम्बर ’12 में प्रकाशित हुआ है। अभी हाल ही में यह आलेख प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘वीणा’ (इन्दौर) के अंक-1025, मई-2013 में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ है। कुछ अन्य पत्रिकाओं ने भी इसे ‘साभार’ प्रकाशित करने के संकेत दिये हैं। 
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आलेख:

मुक्तक : कुछ विचार, कुछ प्रकार
  -जितेन्द्र ‘जौहर’


दि कतिपय उत्कृष्‍ट एवं विशिष्‍ट उदाहरणों को अपवाद-रूप में परे हटा दिया जाय, तो मुक्तक-परिक्षेत्र में काफी असंतोषजनक स्थिति दिखायी पड़ती है। इसका सबसे बड़ा कारण शिल्पगत अध्ययन के प्रति उदासीनता है। हिन्दी काव्य के इस लघु परिक्षेत्र में संव्याप्‍त भाव-भाषा-शिल्प की अराजकता का ग्राफ इतना ऊँचा है, जिसे देखकर किसी भी विधा-मर्मज्ञ को आश्‍चर्य हो सकता है। कहीं किसी पत्रिका में ‘रुबाई’ शीर्षक के अन्तर्गत मुक्तक/क़त्‍आत्‌ प्रकाशित मिल जाते हैं, तो कहीं मुक्तक/क़त्‍आत्‌ की चारों पंक्तियाँ चार अलग-अलग छंदों/बह्‌रों से नज़रें मिलाती नज़र आ जाती हैं; इसे रचना का ‘भैंगापन’ कह देना, अनुचित नहीं जान पड़ता। इतना ही नहीं, कभी-कभी तो चार में से एक भी पंक्ति किसी छंद/बह्‌र की कसौटी पर खरी नहीं उतरती...न मात्रिक और न ही वार्णिक। भाव और भाषा के जो दोष होते हैं, सो अलग! इसके अतिरिक्त कुछ छपास-प्रेमी कविगण अपनी छोटी-बड़ी बह्‌रों पर आधारित ग़ज़लों में से किन्हीं मिलते-जुलते भावों पर टिके दो अश्‌आर (प्रायः एक मत्ला + एक शे’र) मिलाकर ‘मुक्तक’ के रूप में खपा देते हैं। यह विडम्बना ही है कि जिन महाशयों को स्वयं ही किसी विधा-विशेष का समुचित ज्ञान नहीं है, वे भी उल्टा-सीधा (जैसा भी है) थोड़ा-बहुत काम करके स्वयं को विधागत पुरोधा बनाकर पेश करते रहे हैं। उदाहरणार्थ, देश के लगभग हर क्षेत्र में ऐसे स्व-घोषित अथवा स्वजन-प्रक्षेपित ‘ग़ज़ल-सम्राट’ मौजूद हैं, जिनकी स्वयं की ग़ज़लें भाव-भाषा-शिल्प की चौखट पर घुटने टेक देती हैं। यही बात कमोवेश ‘मुरुक़-प्रदेश’ पर भी लागू है- मुरुक़...अर्थात्‌ ‘मुक्तक+ रुबाई+ क़ता’। सौभाग्यवश ‘सरस्वती सुमन’ जैसी प्रतिष्‍ठित पत्रिका के अतिथि संपादक के रूप में मुझे देश-देशान्तर के ४२५ से अधिक मुरुक़-लेखकों से सीधे संपर्क में आने का भरपूर अवसर मिला। उस दौरान कुछेक दर्जन ऐसे कविगण मिले, जिन्होंने अपनी मुक्तकाभिव्यक्तियों से मन मोह लिया। वहीं कुछ ऐसे कवियों से भी भेंट हुई, जो अपने मुक्तकों को ‘रुबाई’ कहते हैं। इन्हीं में से एक सज्जन ने तो अपने मुक्तक/क़त्‍आत्‌ का एक ऐसा संग्रह छपवा लिया, जिसमें आरम्भिक पृष्‍ठ पर शीर्षक के नीचे कोष्‍ठक में दर्ज है- ‘रुबाइयाँ’, जबकि उसमें शायद ही कोई ‘रुबाई’ शामिल हो! 

मुक्तक-परिक्षेत्र में व्याप्‍त उक्तवत शैल्पिक अराजकता के उदाहरण-वैपुल्य के बीच एक बानगी नीचे प्रस्तुत है, जिसके रचयिता का नाम प्रकाशित करना कोई आवश्यक नहीं है। यहाँ मेरा उद्‍देश्य नवोदितों एवं जिज्ञासुओं के सम्मुख उदाहरण-सम्मत विचार प्रस्तुत करना है-

तन के तानपुरे की सुन ले, ये मिट्‍टी की महिमा गाता है
ख़ुद अपनी पे आ इतना इतराता है, इठलाता है, मदमाता है
महाबली भीम की जब लेती है यहाँ चिता परीक्षा
एक लकड़ी भी वो अपनी छाती से हटा नहीं पाता है।

‘छंद/बह्‌र’ के धरातल पर लड़खड़ाता हुआ उपर्युक्त मुक्तक निःसंदेह एक बड़ी ‘सर्जरी’ की माँग करता है। यह मुक्तक स्पष्‍ट संकेत दे रहा है कि मुक्तककार के पास भाव और विचार का ‘अभाव’ नहीं है। उसके पास न तो शब्दों का अकाल है, और न ही समुचित उदाहरण अथवा दृष्‍टान्त चुन लेने की क्षमता की कमी। उसके पास कमी है, तो बस सम्यक्‌ ‘छंद-ज्ञान’ की, जिसके चलते उसके सुन्दर भाव, सारगर्भित विचार और सराहनीय शब्द-चयन आदि सब-के-सब धरे-के-धरे रह गये। छंद-ज्ञान के अभाव ने कवि के इस मुक्तक में अनुस्यूत ‘तन के तानपुरे’ का सुन्दर एवं अनुप्रास-युक्त रूपक तो सस्ते में गँवा ही दिया, साथ ही ‘मिट्‍टी’ और ‘भीम’ की सांकेतिकता पर भी ग्रहण लगा दिया है। इस मुक्तक की स्थिति कमोवेश वैसी ही है, जैसे कोई ‘श्रेष्‍ठ विचारों वाला व्यक्ति’ अस्त-व्यस्त दशा में किसी सार्वजनिक समारोह में उपस्थित हो गया हो आकर! इस सबके बावजूद इसमें गुँथे भावों-विचारों की उत्कृष्‍टता ने मुझे प्रेरित किया कि इसका कमोवेश ‘ऑपरेशन’ किया जाय। ऐसा ऑपरेशन, जिसमें थोड़ा-बहुत शिल्पगत समझौता स्वीकार करते हुए मुक्तककार (?) के मूल भाव-विचार में कोई विशेष अन्तर उत्पन्न न होने पाये। सो मैंने अपनी सीमित समझ के आधार पर एक लघु प्रयास किया, परिणाम नीचे प्रस्तुत है-

तन का तानपुरा हरपल मिट्‍टी की महिमा गाता है
फिर भी अपनी पर आकर मानव अक्सर इठलाता है
मृत्यु परीक्षा लेती है जब भीम-तुल्य बलशाली की
लकड़ी का इक टुकड़ा भी छाती से हटा न पाता है।

इसे एक सीमा तक ‘पुनर्लेखन’ की संज्ञा भी दी जा सकती है, यह अलग बात है कि अभी भी इस मुक्तक के स्तर में ‘श्रीवृद्धि’ का मार्ग अवरुद्ध नहीं है। श्रेष्‍ठता की गुंजाइश तो सदैव बनी ही रहती है। और फिर...एक बात यह भी कि कोई भी लौकिक सृजन, संशोधन अथवा अनुसृजन ब्रह्मा की लिपि नहीं है। मेरा उपर्युक्त प्रयास भी इसका कोई अपवाद नहीं है। बहरहाल उदाहरण एवं अनुभव इतने कि यदि लिखने बैठूँ, तो एक भारी-भरकम ग्रंथ तैयार हो जाय। फ़िलहाल यहाँ मुख्य प्रकरण (विषय) से जुड़कर बात को आगे बढ़ाना उचित होगा। इस क्रम में, सबसे पहले बात करता हूँ- ‘दोहा-मुक्तक’ पर। दोहा-मुक्तककारों में सम्प्रति सिर्फ़ दो प्रमुख कवियों के नाम और काम मेरे संज्ञान में आये हैं; एक डॉ. ब्रह्मजीत गौतम और दूसरे श्री कमलेश व्यास ‘कमल’। इन कवि-द्वय का एक-एक उदाहरण क्रमशः नीचे प्रस्तुत है-

जीवन क्या है अन्ततः सिर्फ़ सुखों की झील
अथवा है यह दुख-भुझी एक नुकीली कील
सुख औ’ दुख के बीच जो जलती आठों याम 
जीवन है वह वस्तुतः एक सुभग कंदील। 
                                                                                                                    (डॉ. ब्रह्मजीत गौतम)

कहना न होगा कि जब कोई कवि अपनी रचनाओं में मुहावरों का यथोचित प्रयोग करता है, तब उसका सृजन और भी अर्थ-दीप्‍त हो उठता है। निम्नांकित दोहा-मुक्तक में परम्परागत कथ्य के बावजूद मुहावरेदार भाषा-प्रयोग ने रचना को अलंकृत कर सपाटबयानी के धरातल से दूर पहुँचा दिया है। साथ ही, इस दोहा-मुक्तक में प्रयुक्त ‘भरोसा’ को प्रदान की गयी ‘बालू की भीत’ की उपमा ने मुक्तककार की भावाभिव्यक्ति का श्रृंगार कर दिया है-
हुआ भरोसा आजकल, ज्यों बालू की भीत।
नैतिकता अब हो गयी, भूला-बिसरा गीत।
इष्‍ट-मित्र किसको कहें, मतलब के हैं यार,
आज बदलते दौर में, पैसा है तो प्रीत। 
                                                                                                                (कमलेश व्यास ‘कमल’)

यदि आलोचनात्मक दृष्‍टि से देखा जाय, तो विधागत रूप से ‘दोहा’ स्वयं ही ‘मुक्तक काव्य’ के अन्तर्गत आता है, तथापि ‘दोहा’ छंद के अनुशासन में बँधी चतुष्‍पदी रचनाओं अर्थात्‌ ‘दोहा-मुक्तकों’ पर कोई प्रश्‍न-चिह्न लगाना उचित नहीं जान पड़ता है। माना कि वह चतुष्‍पदी रचना अपनी तृतीय पंक्ति में दोहा की निर्धारित तुकान्त-योजना को भंग कर देती है, तथापि उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वह समतुकान्तता की छूट लेकर भी दोहा छंद को भंग नहीं करती। इस बिन्दु के समर्थन में मेरा तर्क यह कि उस तृतीय पंक्ति में ‘विषम’ की प्रयुक्ति मुक्तक के लिए निर्धारित एक तुकान्त-योजना ‘सम-सम-विषम-सम’ के निर्वाह के लिए होती है, जो कि ‘दोहा’ छंद में रचित चतुष्‍पदियों को विधागत मानक पर खरा सिद्ध करती है। सच यह भी है कि दोहा-मुक्तककारों के सम्मुख चारों पंक्तियों को ‘सम-सम-सम-सम’ के विधान में प्रस्तुत करने का विकल्प भी खुला हुआ है। अभी तक किसी भी दोहा-मुक्तककार का ऐसा कोई मुक्तक मेरी दृष्‍टि से नहीं गुज़रा है। इस दिशा में भी काम किया जा सकता है। ‘सम-सम-सम-सम’ के तुक विधान से बचने का एक कारण शायद यह भी हो सकता है कि इस तुक-विधान में दोहा-मुक्तक रूपी ‘चतुष्पदियों’ में दो मिलते-जुलते भावों-विचारों वाले दोहों के संयुक्त होने की भ्रमपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो सकती है, लेकिन मेरी विनम्र राय में जहाँ तक ‘सम-सम-सम-सम’ के विधान की बात है, तो कहना होगा कि जब यह तुकान्त-योजना मुक्तक, रुबाई, क़त्‍अः में स्वीकार्य है, तो दोहा-मुक्तकों में क्यों न स्वीकार की जाय? प्रसिद्ध छंद-पथी कवि श्री धनीराम ‘बादल’ (उज्जैन) का एक क़त्‍अः/मुक्तक देखें, जिसमें चारों मिसरे क़ाफ़िया-रदीफ़ से बँधे हैं-

बन्द यारों के लब रहे होंगे
कुछ तो इसके सबब रहे होंगे
डर दिलों में ग़ज़ब रहे होंगे
मर्द लफ़्ज़ों में सब रहे होंगे।

उपर्युक्त मुक्तककार का ही एक अन्य मुक्तक देखें, जिसमें तीसरे मिसरे को क़ाफ़िया-रदीफ़ के बंधन से मुक्त रखा गया गया है। इसमें कविवर ‘बादल’ का अन्दाज़े-बयाँ भी क़ाबिले-ग़ौर है:

ऐसा इन्कार कि इक़रार की हद को छू ले
ऐसा ठहराव कि रफ़्तार की हद को छू ले
बुत बने बैठे हैं, नज़रें ये मगर कहती हैं
ख़ामुशी ऐसी कि गुफ़्तार की हद को छू ले।

सर्व-विदित है कि हिन्दी में सर्वाधिक मुक्तक ‘सम-सम-विषम-सम’ के विधान में ही निबद्ध हैं। यहाँ पुनः स्पष्‍ट करना चाहूँगा कि ‘सम-सम-विषम-सम’ के विधान में रचे गये दोहा-मुक्तक पूर्णतः स्वीकार्य हैं। इसे ‘दोहा’ छंद मे किये गये ‘नये प्रयोग’ के रूप में स्वीकार किये जाने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इतिहास साक्षी है कि काव्य-मर्मज्ञों ने समय-समय पर छंद के क्षेत्र में नये-नये प्रयोग किये हैं; एक सद्यस्क उदाहरण तो ‘जनक’ छंद का भी उल्लेख्य है, जिसकी वंशावली ‘दोहा’ छंद से जुड़ी है। उधर ‘कुण्डलिया’ में भी इसके प्रयोग से हम सभी परिचित हैं ही।

‘मुरुक़-प्रदेश’ में एक नया प्रयोग हाइकु-मुक्तक और ‘हाइकु-रुबाई’ के रूप में भी किया गया है, जिसकी बानगी इन पंक्तियों के लेखक (मै स्वयं) द्वारा संपादित त्रैमा. ‘सरस्वती सुमन’ (देहरादून) के ‘मुरुक़ विशेषांक’ में देखी जा सकती है। उस बहुचर्चित विशेषांक में प्रथम बार इतने प्रयोगवादी मुक्तक, रुबाइयाँ एवं क़त्‍आत एक-साथ प्रकाशित हुए हैं। वरिष्‍ठ साहित्यकार श्री रामेश्‍वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एवं डॉ. बिन्दु जी महाराज (भारत), डॉ. हरदीप कौर ‘संधु’ तथा भावना कुँवर (ऑस्ट्रेलिया), रचना श्रीवास्तव (अमेरिका) आदि के अतिरिक्त सुप्रसिद्ध कवि एवं समीक्षक डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ (फ़िरोज़ाबाद) के भी ‘हाइकु-मुक्तक’ यत्र-तत्र प्रकाशित देखे गये हैं।

यहाँ एक विशेष प्रयोग की दृष्‍टि से वरिष्‍ठ कवि एवं संपादक श्री रामेश्‍वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की एक रचना देखें, जो 5-7-5  के वर्णक्रम में 17 आक्षरिक त्रिपदकि छंद अर्थात्‌ ‘हाइकु’ के साथ ही मुक्तक/क़त्‍आत्‌ की छांदसिक कसौटी पर भी खरी उतरती है। उनका यह ‘हाइकु-मुक्तक’ शैल्पिक दृष्‍टि से ‘ग़ैर मुरद्‍दफ़’ कोटि में परिगणित है। इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह कि हाइकु-मुक्तक में कवि पर ‘हाइकु’ के साथ ही मुक्तक/क़त्‍आत्‌ के छंद-निर्वाह का दोहरा दायित्व होता है। यही कारण है कि ‘हाइकु-मुक्तक’ अपेक्षाकृत एक कठिन विधा है, जिसे हर हाइकुकार सहजतापूर्वक नहीं साध पाता है। जितने भी हाइकुकारों के ऐसे सृजन-प्रयास मेरे दृष्‍टि-पथ से गुज़रे हैं, उनमें से अधिकतर ‘हाइकु-मुक्तक’ के नाम पर विकलांग-प्रस्तुतियाँ ही दे सके हैं। निम्नांकित रचना में श्री काम्बोज जी ने हाइकु के साथ ही 26 मात्रिक छंद-विधान को बड़ी कुशलता से निभाया है-

      इस जग में/ कितनों ने समझी/ आँसू की बोली
      सबके आगे/ कितनों ने दुःख की/गठरी खोली
      क्या जाने कोई/दुख की गहराई/ दुखदायक
      चुपके से आ/ किसने जीवन में/मिसरी घोली!

इस लघु आलेख में स्थानाभाव के चलते ‘हाइकु-रुबाई’ का उदाहरण-सम्मत उल्लेख संभव नहीं हो पा रहा है, तथापि अब तक सिर्फ़ चार हाइकु-रुबाईकारों के नाम मेरे संज्ञान में हैं; यथा-  स्वामी श्यामानन्द सरस्वती ‘रौशन’,  श्री धनसिंह खोबा ‘सुधाकर’,  डॉ. मिर्ज़ा हसन ‘नासिर’ एवं श्री इब्राहीम ‘अश्क’।

उपर्युक्त से इतर सामान्य प्रचलित मुक्तक/क़त्‍आत में भी, ग़ज़लों की तरह ‘ग़ैर मुरद्‌दफ़’ चतुष्पदियों के बहुतेरे उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। सुप्रसिद्ध कवि डॉ. मधुसूदन साहा (उड़ीसा) के संग्रह ‘मुक्‍तक मणि’ (चयन एवं संपादन : जितेन्द्र ‘जौहर’) में शामिल एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है-

वक़्त कहता होंठ अपने आज खोलो
चल पड़ा है क़ाफ़िला तुम साथ होलो
बाहुबलियों से अगर यूँ ही डरोगे,
‘कल’ करेगा क्यों तुम्हें फिर माफ़ बोलो?

सुपरिचित कवि श्री दीपक ‘दानिश’ का यह क़ता/मुक्तक देखें, जिसमें चारों मिसरे/पंक्तियाँ परस्पर सुसम्बद्ध हैं। यहाँ पहली पंक्ति में जिस विषय को प्रवर्तित किया गया है, दूसरी पंक्ति ने उसमें एक नया आयाम जोड़ दिया है। आगे के क्रम में तीसरी पंक्ति एक आवश्यक बुनियाद खड़ी करने में सफल हुई है, जिस पर चौथी प्रभावपूर्ण पंक्ति काफी सरलता से टिक गयी है- 

उनसे शाख़ों पे इक तबस्सुम था
तिनके-तिनके में इक तरन्नुम था
शह्‌र से अब जो उड़ गये पंछी
शह्‌र उनके लिए जहन्नुम था।

उपर्युक्त चौपदी में यह भी ध्यातव्य है कि प्रथम पंक्ति ने विषय-प्रवर्तन के बावजूद कथ्य को पूर्णतः उद्‍घाटित नहीं किया है, बल्कि उसने एक पाठकीय जिज्ञासा जगा दी है। पंक्ति पुनः देखें- ‘उनसे शाख़ों पे इक तबस्सुम था।’ यहाँ प्रश्‍न उठता है कि ‘किनसे...तबस्सुम था?’ इसका उत्तर अभी अनुपलब्ध है। उत्तर की यह अनुपलब्धता की स्थिति द्वितीय पंक्ति में भी यथावत है, अर्थात्‌...यहाँ भी ‘पाठकीय जिज्ञासा’ अग्रसारित हो गयी है। जिज्ञासा के वशीभूत पाठक आगे बढ़ता है, तृतीय पंक्ति तक पहुँचकर उसे वांछित उत्तर प्राप्‍त हो जाता है- ‘पंछी’। अब रही बात चतुर्थ पंक्ति की, तो कहना होगा कि वह एक विशेष तेवर के साथ उतरी है...रूपकाभा लेकर। स्पष्‍टतः यह चौपदी हमारी पर्यावरणीय दशा को दर्शाने में एक बड़ी सीमा तक सफल हुई है, जिसमें ‘जहन्नुम’ शब्द अपनी केन्द्रीय भूमिका निभा रहा है। इन सब ख़ूबियों के बीच, शिल्प एवं प्रकार की दृष्‍टि से इस चौपदी को और भी विशेष बनाया जा सकता था,  एक लघु परिवर्तन के माध्यम से।

वरिष्‍ठ कवि डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ का एक मनभावन मुक्तक देखें, जिसमें मुक्तककार ने बिना कोई मात्रा गिराये अपने भावों-विचारों को अभिव्यक्त करने में सफलता पायी है। निःसंदेह यह मुक्तक हिन्दी के ‘विधाता’ छंद के समुचित निर्वाह का एक उत्कृष्‍ट उदाहरण है, जिसमें ‘यति-गति’ के निर्धारित विधान का भी पूरा ध्यान रखा गया है। इसे मैंने अपने स्तम्भ ‘तीसरी आँख’ (त्रैमा. ‘अभिनव प्रयास’) की एक क़िस्त में छंद के स-लक्षण उल्लेख के साथ सम्मिलित करते हुए लिखा था कि श्रृंगार-रस में आप्लावित डॉ. ‘यायावर’ के निम्नांकित मुक्तक में जहाँ मधुर चुम्बन की वाचालता है, तो वहीं उसके माधुर्य को अभिव्यक्त कर पाने की भाषागत असमर्थता भी...‘ज्यों गूँगे को गुड़’! यह मुक्तक पढ़ते ही मेरी स्मृति में कविवर त्रिलोचन आ गये...यह कहते हुए कि-  ‘भाषा के भी परे प्राण लहरें लेता है!’  यहाँ पंक्ति-चतुष्‍टय की भावगत सुसंबद्धता द्रष्‍टव्य है। साथ ही, यह भी कि तीसरी पंक्ति को कितनी कलात्मकता के साथ चौथी पंक्ति का सोपान बनाया गया है! बहरहाल मुक्तक का आनन्द लीजिए-

हृदय की पीर को कब कह, सकी संसार की भाषा
बहुत वाचाल चुम्बन के, मधुर उपहार की भाषा
हज़ारों गीत-ग़ज़लों में, नहीं है व्यक्त हो पाती
तुम्हारे रूप की भाषा, हमारे प्यार की भाषा।

वरिष्‍ठ कविवर श्री चन्द्रसेन विराट के व्यापक मुक्तक-संसार की बात ही निराली है। उनके अधिकांश मुक्तक शिल्प के सुन्दर सीप से ढलकर निकले प्रौढ़-परिपक्व भावों-विचारों के मनहर मोती हैं। अब तक के मेरे निजी संज्ञानानुसार हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक मौलिक मुक्तक-संग्रह (कुल पाँच संग्रह) प्रकाशित होने का गौरव उनके नाम के साथ जुड़ा है। आज जहाँ एक ओर तमाम कविगण स्वयं को ‘मुक्तक-महर्षि’ अथवा ‘मुक्तक-सम्राट’ आदि न जाने कितनी ही संज्ञाएँ देने में लेश-मात्र भी संकोच नहीं करते, वहीं दूसरी ओर कविवर विराट अपने सुविस्तृत ‘मुक्तक-संसार’ में मौन साधनारत रहकर ‘मुरुक़-प्रदेश’ के मुक्तक परिक्षेत्र को समृद्ध कर रहे हैं। उनकी एक चौपदी देखें, जो अपने सूक्तिपरक रूप में पाठकों के लिए उरग्राही हो गयी है-

विष को पीने की कला आती है
घाव सीने की कला आती है
दुख के अनुभव से गुज़रकर जग में
सुख से जीने की कला आती है।

किसी भी लघु आलेख में विषय को समग्रता में प्रस्तुत कर पाना प्रायः संभव नहीं हो पाता है। अतः इसमें मुक्तक के प्रकारादि से जुड़े अनेक महत्त्वपूर्ण बिन्दु छूट गये हैं, जिन पर चर्चा फिर कभी होगी।

- जितेन्द्र ‘जौहर’
आई आर-13/3, रेणुसागर, सोनभद्र (उप्र) 231218.
मोबा.  : +91  9450320472  
ईमेल:  jjauharpoet@gmail.com

Wednesday, June 6, 2012

उच्चारण पर आधारित ‘वज़्न’ के प्रसंग पर


सम्मानित पाठकगण,
                       निम्नांकित ग़ज़ल पर कुछ मित्रों, अनुजों एवं अग्रजों (सर्वश्री Dhruvendra Bhadauria, Nitesh Bisht, Harish Darvesh, Kumar Manoj, Megh Shyam Pandit, आदि ) ने प्रेरित किया कि मैं उपर्युक्त  ‘वज़्न’  प्रसंग पर अपनी राय दूँ। अतः यह पोस्ट एक लघु आलेख की प्राथमिक रूपरेखा के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ...समय मिला तो इसे और भी विस्तार देने का प्रयास करूँगा...कुछ अन्य तथ्यों-तर्कों-प्रमाणों के साथ...संशोधित/परिवर्द्धित रूप में...!

साभिवादन,
जितेन्द्र ‘जौहर’
_____________


शाम-सवेरे सोच रहा है मन मेरा।
जाने कब करवट लेगा जीवन मेरा।


वह कोमल स्पर्श तुम्हारा कैसा था,
सिहर उठा करता है अब भी तन मेरा।


सच बतलाऊँ धूप पराई लगती है,
बदल गया है जिस दिन से आँगन मेरा।


तेरी यादों की चौखट पर अब तो बस, 
मै रहता हूँ और अकेलापन मेरा।


मै रेतीली राहों का अनुयायी हूँ,
साथ निभायेगा कब तक सावन मेरा?
                               -Harish Darvesh
...

उपर्युक्त ग़ज़ल पर-

Jitendra Jauhar का कहना था:
इस प्यारी-सी ग़ज़ल के लिए बधाई...! वह शे’र जो कि हासिले-ग़ज़ल है-
मै रेतीली राहों का अनुयायी हूँ,
साथ निभायेगा कब तक सावन मेरा!

यह शे’र दर्द की अनुभूति का धारक/ वाहक बनकर आया है-
तेरी यादों की चौखट पर अब तो बस, 
मै रहता हूँ और अकेलापन मेरा।

निम्नांकित शे’र काफी अच्छा है...लेकिन इसमें थोड़ा-सा तकनीकी दोष है, आप-जैसे दानिशमंद शाइर के लिए इशारा ही बहुत है-
वह कोमल स्पर्श तुम्हारा कैसा था,
सिहर उठा करता है अब भी तन मेरा ।


 Harish Darvesh जी का कहना था :
‘...प्रवाह को बनाये रखने वाले शब्दों को उनके उच्चारण के अनुसार वज़्न लेने कोई हर्ज़ नही है।’

 Dhruvendra Bhadauria जी का कहना था:
‘...समय के साथ संविधान बदलता है, छंद विधान भी बदलता है। संस्कृत के छंद नियमों में बदलाव की ज़रूरत है, भार गणना अब उच्चारण के अनुसार ही करनी होगी...।’

__________


~ समालोचना ~

Harish Darvesh जी का यह कथन पूर्णतः स्पष्‍ट नहीं है- ‘प्रवाह को बनाये रखने वाले शब्दों को उनके उच्चारण के अनुसार वज़्न लेने में कोई हर्ज़ नही है।’

अतः हम इस कथन को समुचित विमर्श-योग्य बनाने के लिए, इसे भलीभाँति समझने के लिए...सही दिशा में एकनिष्‍ठ एवं सार्थक संवाद के लिए...सर्वप्रथम इसके दो सरलीकृत खण्ड कर लेते हैं। यूँ कि-

1. प्रवाह को बनाये रखने वाले शब्द
2. (किसी काव्य रचना में) ‘शब्दों को उच्चारण के अनुसार वज़्न में बाँधना’ या प्रयोग करना। 



उपर्युक्त Point  नं. 1 के संदर्भ में: 

एक प्रश्‍न-
‘क्या किसी कविता-विशेष में ‘प्रवाह’ को बनाये रखने वाले कुछेक शब्द ही होते हैं... अथवा... उस कविता में प्रयुक्त सभी शब्द ‘लय-प्रवाह’ में योगदान देते हैं?

स्पष्‍ट उत्तर-
किसी भी छंदोबद्ध रचना में हर शब्द ‘लय-प्रवाह’ में अपना विशिष्‍ट योगदान देता है...(इतस्ततः आख़िरी रुक्न की लघु-मात्रिक इज़ाफ़त एवं अलिफ़ वस्ल, आदि की स्थितियों को अपवाद-रूप में छोडकर), हालांकि अलिफ़ वस्ल में उत्तरवर्ती स्वर पूर्ववर्ती व्यंजन ध्वनि से संधि करके संयुक्त ध्वन्यात्मक भूमिका में आ जाता है। अतः  इसे अपवाद कहना उचित न होगा।

इस प्रकार निष्‍कर्ष यह कि-
‘प्रवाह को बनाये रखने वाले शब्द’ -जैसे वाक्यांश का प्रयोग छंदशास्त्र/अरूज़ की दृष्‍टि से अपना औचित्य सिद्ध नहीं कर पा रहा है; कारण कि किसी भी छंद अथवा बह्‌र में हर ‘शब्द’ ही नहीं, बल्कि हर ‘अक्षर/हर्फ़’ अपनी ध्वन्यात्मक भूमिका के साथ किसी लयखण्ड अथवा रुक्न-विशेष के साँचे में ढलकर...फ़िट होकर... उतरता है। जहाँ कहीं वह साँचे में फ़िट नहीं हो पाता है, वहीं-वहीं वह छंद-दोष का शिकार हो जाता है...बह्‍र से खारिज हो जाता है। यह बिन्दु अब यहीं समाप्‍त...!



अब बात करता हूँ- Point नं. 2 पर :
यानी...‘शब्दों को उच्चारण के अनुसार वज़्न में बाँधना’!  Harish Darvesh जी का यह कथन सर्वथा उचित एवं स्वीकार्य है, ले...कि...न यहाँ हमें सही उच्चारण और ग़लत उच्चारण के बीच का अन्तर भी ध्यान रखना होगा। दरअस्ल हम लोग-

‘स्नान’  = इस्नान
‘स्कूल’  = इस्कूल 
‘स्कूटर’ = इस्कूटर 
‘स्थिति’ = इस्थिति
‘स्पात’  =  इस्पात
‘स्पर्श’  =   इस्पर्श

-बोलने के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि ग़लत उच्चारण हमें सही जान पड़ता है। यदि हम उपर्युक्त अशुद्ध भाषिक परम्परा का अनुमोदन करते हुए...मान्यता देते हुए...  ग़लत प्रचलित वज़्न पर बाँधने लगेंगे, तो फिर आम बोलचाल में प्रचलित अशुद्ध उच्चारण के अनुसार-

ग़लत     = गल्त 
पलटना  = पल्टना
वज़्न      = वज़न
जानते हैं = जान्ते हैं
मानते हैं = मान्ते हैं
सीखते हैं = सीख्ते हैं


-आदि अगणित शब्दों को भी उपर्युक्त ग़लत वज़्न में बाँधना पड़ेगा, जिसकी अनुमति छंदशास्त्र कदापि नहीं दे सकता। सृजन में स्वविवेक से वज़्न बाँधने वाली ‘छूट’ का अनुमोदन इसलिए भी नहीं किया जा सकता क्योंकि उससे न केवल छंद के क्षेत्र में, बल्कि भाषागत विकृतियाँ भी बढ़ जायेंगी। लेखक सिर्फ़ साहित्य-सेवक नहीं होता, वह भाषा-सेवक भी होता है। भारतेन्दु हरिश्‍चन्द, डॉ. श्यामसुन्दर दास, डॉ. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आदि सिर्फ़ साहित्यकार ही नहीं थे, वे सच्चे भाषा-सेवक भी थे। अब हम अपना लक्ष्य... स्वयं तय कर सकते हैं कि हम अपने लिए...साहित्य के लिए...भाषा के लिए क्या करने जा रहे हैं!

अब एक नज़र निम्नांकित शब्दों पर, जिनकी अनेक वर्तनियाँ प्रचलित हैं...और सभी मान्य हैं। हमें अपने छंद-दोषों को ढकने के लिए इनका अथवा अन्य अनेक अपवादों का सुविधाजनक व्याख्यापूर्ण उपयोग (वस्तुतः ‘दुरुपयोग’) नहीं करना चाहिए-

यत्‍न = यतन = जतन
रत्‍न = रतन  
दर्शन = दरस
स्पर्श = परस

उपर्युक्त के अतिरिक्त, कुछ शब्द-रूप हिन्दी-उर्दू में अनेक कवियों ने (अज्ञानवश अथवा समझौता करते हुए) अपनी सुविधानुसार वज़्न में बाँधे हैं-

शह्‌र = शहर
सिफ़्र = सिफ़र
ठहर = ठैर
उम्र = उमर

अब एक नज़र कुछ काव्य-उदाहरणों पर...! सुपरिचित युवा कवि मनोज अबोध के इस मुक्तक में ‘स्मरण’ शब्द का प्रयोग वर्तनी के समझौते के साथ किया गया है। उच्चारण पर आधारित यह प्रयोग भाषा के अपभ्रंश-रूप से जुड़ा है, जिसे खड़ी बोली के सृजन-कर्म में उचित नहीं माना जाता है। यहाँ स्पष्‍ट कर दूँ कि उनका यह प्यारा-सा एवं भावपूर्ण मुक्तक सिर्फ़ उदाहरण देने के शुद्ध-सात्विक मनोभाव से...शिवोद्‍देश्य से... प्रस्तुत कर रहा हूँ, न कि किसी दुर्भावना से-

पीर का सम्‍वरण प्रेम है।
नींद का अपहरण प्रेम है।
याद की झील में डूबकर,
अनवरत स्‍मरण प्रेम है।
ऽ । ऽ- ऽ । ऽ- ऽ । ऽ

ऐसा ही एक प्रयोग सुपरिचित कवि एवं संपादक अशोक ‘अंजुम’ की भी एक ग़ज़ल के मत्ले (?) में दिखा था-


वे अच्छे-अच्छों के भी दुम उगा के छोड़ेंगे।
सारे स्टाफ़ को चमचा बना के छोड़ेंगे। 

अब हिन्दी के प्रतिष्‍ठित कवि चन्द्रसेन विराट के एक मुक्तक की चौथी पंक्ति देखें, जिसमें ‘स्नान’ को ‘ऽ ।’ के सही मात्रात्मक भार पर बाँधा गया है-

वेदना  के  विधान  जैसा है।
विष के घूँटों के पान जैसा है।
गीत लिखना हो या ग़ज़ल कहना,
अग्नि सरिता में स्नान-जैसा है।
ऽ  ।   ऽ  ऽ- ।    ऽ । ऽ- ऽ  ऽ


मेरी विनम्र राय में, जब उस ग़लत उच्चारण के वज़्न पर बँधे शब्द-विशेष का सही और सुन्दर विकल्प उपलब्ध हो, तब ग़लत वज़्न पर बँधे शब्द के सही विकल्प को चुन लेने में कोई बुराई नहीं है। ग़लत वज़्न पर बँधे शब्द किसी भी छंदोबद्ध रचना पर ‘ग्रहण’ लगाते हैं। Jokingly... मैं छंदभंग होने की ऐसी स्थितियों को प्रायः ‘सूर्य-ग्रह’ और ‘चन्द्र-ग्रहण’ की तरह ‘छंद-ग्रहण’ कहता हूँ।

यहाँ हरीश दरवेश जी के संदर्भित शे’र पर भी यह बात लागू होती है। वे (बल्कि...अरूज़ी सूझबूझ रखने वाले सभी कविगण) इस बात से निश्‍चित रूप से सहमत होंगे कि जब विकल्प न हो, तब समझौता कर लेने की मजबूरी को समझा जा सकता है, लेकिन श्रेष्‍ठ विकल्प की उपलब्धता की स्थिति में समझौता मेरी समझ से परे है। हरीश जी के संदर्भित शे’र के लिए कई विकल्प हो सकते हैं, जो कि आगे दिये गये हैं।


_____

उपर्युक्त सभी (परस्पर विपरीत...यानी- ‘शुद्ध-अशुद्ध’) उदाहरणों के आलोक में Harish Darvesh जी के निम्नांकित शे’र के बेहतर समाधानयुक्त विकल्प नीचे प्रस्तुत हैं। उनका अपना शे’र है-

‘वह कोमल स्पर्श तुम्हारा कैसा था,
सिहर उठा करता है अब भी तन मेरा।’

समाधानपूर्ण विकल्प यूँ हो सकते हैं...यह मेरी सीमित साहित्यिक समझ पर आधारित एक आदमक़द कोशिश है, जो कि ‘अनन्तिम’ है...साथ ही किसी के लिए ‘बाध्यकारी नहीं’ है-


-(एक)-

कैसा था संस्पर्श तुम्हारा वह कोमल,
पुलकित हो उठता है अब भी तन मेरा।

-(दो)-

वह कोमल संस्पर्श तुम्हारा कैसा था,
पुलकित हो उठता है अब भी तन मेरा।

नोट:-
उपर्युक्त समाधान नं. २ में अभी भी एक छोटा-सा दोष है, जो कि बहुतेरे कवियों के यहाँ मिल जाता है...यत्र-तत्र मैंने भी अपने निजी लेखन में विकल्प की (‘दोष-रहित उपलब्धता’ के बावजूद) इसका निराकरण नहीं किया क्योंकि उससे रचना की रवानी न्यूनाधिक बाधित होती हुई-सी जान पड़ रही थी।


चलते-चलते :
श्री ध्रुवेन्द्र भदौरिया जी के इस कथन-  ‘...भार गणना अब उच्चारण के अनुसार ही करनी होगी...।’ -से मैं अपनी विनम्र असहमति प्रकट करना चाहता हूँ। कारण कि उनके इस विचार के अनुपालन से छंद के क्षेत्र में एक प्रकार की आराजक स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। क्योंकि- ‘कोस-कोस पर पानी बदले, तीन कोस पर बानी...’देश के विभिन्न हिस्सों में एक ही भाषा-भाषी लोग भिन्न-भिन्न उच्चारण भी करते हैं। तब पंजाब का छंदशास्त्र कुछ और हो जायेगा...बंगाल का कुछ और...केरल का कुछ और...उ.प्र का कुछ और! वैसे भी आज मंचों पर हर गवैय्या कवि अपनी-अपनी सुविधा से टेढ़ी-मेढ़ी काव्य रचना को अपनी सुविधानुसार खींच-घसीटकर गा ही ले जा रहा है...ताली बजाने वाले ताली बजा रहे हैं...दोनों ही पक्ष ख़ुश हैं...! कवि तालियों से ख़ुश... और श्रोतागण गलेबाज़ी से ख़ुश...! इस उभयपक्षीय ‘ख़ुश’ होने के अराजक माहौल में श्रेष्‍ठ सृजन मंच पर नाम-मात्र का रह गया है। यह स्थिति साहित्य की दृष्‍टि से सर्वथा असात्म्य है। वैसे यह सर्वविदित है कि उर्दू-फ़ारसी बह्‌रें उच्चारण (अर्थात्‌ ‘ध्वनि’) पर ही आधारित हैं...लेकिन यहाँ मित्रों का अभिप्राय शुद्ध-अशुद्ध (जो भी प्रचलित है) उस उच्चारण से है। अतः मेरी असहमति का अपना एक साहित्यिक आधार है। 

अब सर्वाधिकार आप सभी विद्वानों को है कि आप क्या स्वीकारते हैं, और क्या नहीं...! हाँ, हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि हमारे ‘काव्य-दोष’ किसी ‘सुविधाजनक व्याख्या’ की ‘झीनी चादर’ से ढके नहीं जा सकते हैं।



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अनुरोध:
कृपया अपनी राय दें...!  साथ ही यह भी लिखें कि  क्या आप इस आलेख को परिवर्द्धित रूप में भी पढ़ना चाहेंगे...?


नोट:- 
‘कमेण्ट मॉडरेशन’ के चलते आपकी टिप्पणी के प्रकाशित होने में समय लगता है,  अतः चिंतित न हों।

Monday, May 21, 2012


एक क्षणिका :


रचनाकार
उधर
विसंगतियों पर प्रहार
इधर
विसंगतियों के शिकार,
वाह रे...
रचनाकार!
               
                                                - जितेन्द्र ‘जौहर’



Saturday, May 12, 2012


एक क्षणिका :


गणित ० 


रिश्तों की ‘आधार रेखा’ पर
आशाओं का ‘लम्ब’
जितना ऊँचा उठता जायेगा,
निराशाओं के ‘कर्ण’ की लम्बाई
बढ़ती जायेगी!
                                                     -जितेन्द्र ‘जौहर’

Friday, October 21, 2011


21.10.11


पुरस्कार हेतु प्रविष्‍टियाँ आमंत्रित:

त्रैमा. ‘अभिनव प्रयास’ (अलीगढ़, उप्र) के-
बहुचर्चित साहित्यिक स्तम्भ ‘तीसरी आँख’ की पुरस्कार/सम्मान-श्रृंखला:


पुरस्कार क्रमांक-1: ‘श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति: श्रेष्ठ सृजन सम्मान’
                                               (1100/-रुपये + प्रमाण-पत्र)
   वैदिक क्रांति परिषद की संस्थापिका एवं ‘सरस्वती प्रकाशन’ की प्रेरणास्रोत श्रीमती सरस्वती सिंह जी की पावन स्मृति में निर्धारित उक्त सम्मान साहित्य की किसी भी विधा (गद्य-पद्य) के रचनाकार को देय होगा जिसके लिए प्रविष्‍टियाँ निम्नांकित संलग्नकों के साथ 30 जून 2012 तक सादर आमंत्रित हैं:

1. गद्य या पद्य विधा की तीन फुटकर रचनाएँ (प्रकाशित/अप्रकाशित का बंधन नहीं) मौलिकता प्रमाण-पत्र के साथ।
2. सचित्र परिचय + डाक टिकटयुक्त एक लिफ़ाफ़ा व पता लिखे दो पोस्टकार्ड।

विशेष: इस सम्मान हेतु श्रेष्‍ठ/स्तरीय प्रविष्‍टियों के अभाव की स्थिति में रचनाओं का चयन देशव्यापी पत्र-पत्रिकाओं, इंटरनेट, गद्य/पद्य संग्रहों, आदि में से किया जा सकता है।

      प्रायोजक:                          परामर्शदाता:               चयनकर्ता:                                                                           
  डॉ. आनन्दसुमन सिंह        श्री अशोक ‘अंजुम’     जितेन्द्र ‘जौहर’                                       
(प्र. संपा.‘सरस्वती सुमन) (संपा.‘अभिनव प्रयास’) (स्तम्भकार: ‘तीसरी आँख’)
  देहरादून, उत्तराखण्ड.               अलीगढ़, उ.प्र.             सोनभद्र, उप्र
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पुरस्कार क्रमांक-2: ‘श्री केशरीलाल आर्य स्मृति गीत/दोहा सम्मान’
                                      (5100/-रुपये  + प्रमाण-पत्र)
 आर्य समाज-सेवक, स्वाभिमानी राष्‍ट्रभक्त, पूर्व स्वतंत्रता सेनानी एवं सन्‌ 1930 के स्नातक श्री केशरीलाल आर्य जी की  पावन स्मृति में स्थापित उपर्युक्त वार्षिक सम्मान वरिष्‍ठ गीतकार/दोहाकार डॉ. देवेन्द्र आर्य की पितृ-भक्ति का प्रतीक है। यह सम्मान राष्‍ट्रीय स्तर पर चुने गये किसी श्रेष्‍ठ कवि/कवयित्री (कोई आयु-बंधन नहीं) को गीत अथवा दोहा-सृजन के लिए देय होगा। इस सम्मान हेतु प्रविष्‍टियाँ निम्नांकित संलग्नकों के साथ 31 मार्च 2012 तक सादर आमंत्रित हैं:

1. मौलिक गीत-संग्रह अथवा दोहा-संग्रह (प्रकाशन-वर्ष का कोई बंधन नहीं) की दो प्रतियाँ।
2. सचित्र परिचय, प्रविष्‍टि-शुल्क रु. 200/- (मनीऑर्डर द्वारा; चेक अस्वीकार्य) + डाक टिकटयुक्त एक लिफ़ाफ़ा व पता लिखे दो पोस्टकार्ड।

     प्रायोजक:                  परामर्शदाता:               चयनकर्ता:                                                                             
   डॉ. देवेन्द्र आर्य       डॉ. शिवओम अम्बर      जितेन्द्र ‘जौहर’                                      
(वरिष्‍ठ साहित्यकार)   (वरिष्‍ठ साहित्यकार)    (स्तम्भकार: ‘तीसरी आँख’)
  ग़ाज़ियाबाद, उप्र.           फ़र्रुख़ाबाद, उ.प्र.            सोनभद्र, उ.प्र.
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पुरस्कार क्रमांक-3: ‘श्रीमती रत्‍नादेवी स्मृति काव्य-सृजन सम्मान’ 
                                                   (5001/- रुपये + प्रमाण-पत्र)
डिप्टी कलेक्टर के रूप में तीन दशक का बेदाग़ सेवाकाल बिताने वाले 74 वर्षीय श्री आमोद तिवारीजी शांत स्वभाव एवं वैदुष्य के धनी हैं। उनकी गहन साहित्य-निष्‍ठा का प्रतीक उपर्युक्त वार्षिक सम्मान उनकी स्वर्गीया धर्मपत्‍नी श्रीमती रत्‍नादेवी जी की पावन स्मृति में स्थापित किया गया है जो कि राष्‍ट्रीय स्तर पर चयनित किसी श्रेष्‍ठ कवि/कवयित्री (युवाओं को विशेष वरीयता, तथापि आयु-बंधन नहीं) को देय होगा। इस सम्मान हेतु प्रविष्‍टियाँ निम्नांकित संलग्नकों के साथ 31 मार्च 2012 तक सादर आमंत्रित हैं:

1. काव्य की किसी भी विधा (छांदस/अछांदस) के मौलिक प्रकाशित संग्रह (प्रकाशन-वर्ष का कोई बंधन नहीं) की दो प्रतियाँ अथवा मौलिकता प्रमाण-पत्र के साथ अप्रकाशित कृति (पाण्डुलिपि) अथवा न्यूनतम 15 फुटकर कविताएँ।
2. सचित्र परिचय, प्रविष्‍टि-शुल्क रु. 200/- (मनीऑर्डर द्वारा; चेक अस्वीकार्य) + डाक टिकटयुक्त एक लिफ़ाफ़ा व पता लिखे दो पोस्टकार्ड।


    प्रायोजक:                   परामर्शदाता:                       चयनकर्ता:                                                                             
श्री आमोद तिवारी   डॉ. रा.स.लाल शर्मा ‘यायावर’   जितेन्द्र ‘जौहर’                                       
(पूर्व डिप्‍टी कलेक्टर)     (वरिष्‍ठ साहित्यकार)     (स्तम्भकार: ‘तीसरी आँख’)
   कटनी, म.प्र.                 फ़िरोज़ाबाद, उ.प्र.                 सोनभद्र, उ.प्र.
.................................................................................



विशेष ध्यानार्थ:


1. उपर्युक्त सभी सम्मान/पुरस्कार ‘तीसरी आँख’ द्वारा आयोजित एक भव्य ‘सम्मान-समारोह’ एवं गरिमापूर्ण ‘अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन’ में प्रदान किये जायेंगे जिनका विस्तृत समाचार विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ प्रेषित किया जायेगा। साथ ही, चयनित कवि/कवयित्री की चुनिन्दा रचनाओं को विभिन्न प्रतिष्‍ठित वेबसाइट्‍स/इंटरनेट पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करने का प्रयास रहेगा।

2. चयन-प्रक्रिया अत्यन्त पारदर्शी एवं त्रिस्तरीय होगी जिसे परिणामों के साथ घोषित किया जायेगा। कृतियों के निष्पक्ष चयन का आधार-कथन (संक्षिप्‍त समीक्षा के साथ) ‘तीसरी आँख’ में प्रकाशित करने का प्रयास रहेगा।

3. प्रविष्‍टि-शुल्क का उद्‍देश्य व्यावसायिक नहीं है। इन सम्मानों/पुरस्कारों का मूल उद्‍देश्य श्रेष्‍ठ साहित्य-सृजन को प्रेरित करना है।

4. प्रशंसकों/शुभचिंतकों द्वारा भेजी गयी अपने प्रिय कवि/कवयित्री की प्रविष्‍टियाँ (वांछित संलग्नकों के साथ) स्वीकार्य हैं। 

5. किसी पाण्डुलिपि के चुने जाने की स्थिति में निर्धारित सम्मान/पुरस्कार उसके प्रकाशन हेतु अनुदान-राशि के रूप में प्रदान किया जायेगा।

6. सभी सम्मानों के लिए अलग-अलग प्रविष्‍टियों की छूट उपलब्ध है; लिफ़ाफ़े पर सम्मान/पुरस्कार का नाम एवं क्रमांक स्पष्‍ट रूप से लिखें। संलग्नकों के अभाव में प्रविष्‍टियाँ अमान्य होंगी। 

7. प्रायोजकों अथवा परामर्शदाताओं से चयन-प्रक्रिया अथवा निर्णायक-मण्डल आदि से संबंधित अनपेक्षित जानकारी माँगना अयोग्यता माना जायेगा। किसी भी समय नियम-परिवर्तन एवं अंतिम निर्णय-संबधी सर्वाधिकार उपर्युक्त नामांकित मण्डल के पास सुरक्षित हैं। निर्णय-संबधी कोई भी विवाद कदापि स्वीकार्य नहीं होगा।

8. वांछित संलग्नकों के साथ समस्त प्रविष्‍टियाँ ‘तीसरी आँख’ के निम्नांकित पते पर निर्धारित तिथि से पूर्व भेजें-

जितेन्द्र ‘जौहर’
(स्तम्भकार ‘तीसरी आँख’) 
पत्राचार: आई आर-13/6, रेणुसागर-231218, सोनभद्र (उप्र). 
कार्यस्थल: अग्रेज़ी विभाग, ए.बी.आई. कॉलेज।
मोबा. 09450320472
ईमेल: jjauharpoet@gmail.com