स्वागतम्‌...!


Click here for Myspace Layouts

साथी-संगम

Showing posts with label मुक्तछंद कविता. Show all posts
Showing posts with label मुक्तछंद कविता. Show all posts

Saturday, October 30, 2010

साहित्य में ‘परस्पर यश-गान’ पर...

     हमारा यह दौर... विशेषणों की अपव्ययिता का दौर है। साहित्य में तो कितने ही कविगण ‘उभयपक्षीय लाभ’ के मौन समझौते के तहत एक-दूसरे को ‘कालिदास-भवभूति’ कहकर आत्म-मुग्धता के आनन्द-लोक में उन्मुक्त विचरण करते दिख रहे हैं। आज ये विशेषण  इतने ‘आवारा’ हो गये हैं कि तमाम ब्लॉगों पर ‘विकलांग’ और ‘अल्लम-गल्लम’ कविताओं की भी शब्दारती उतारते दिख जाते हैं।


     यहाँ ‘संज्ञाएँ’ शब्द का प्रयोग सांकेतिक है; यह संकेत उन स्व-घोषित ‘महाकवियों’ को केन्द्र में रखकर रचा गया है जो स्वयं को साहित्य की किसी अंतरिक्षीय कक्षा (Orbit) में स्थापित करने / करवाने के लिए स्व-प्रायोजित ‘महा अभिनंदन-ग्रंथ’ तक प्रकाशित करवा डालते हैं, वह भी अपने ख़र्चे पर... हाऽऽ  हाऽऽ  हाऽऽ...! 
___________________________________


आवारा विशेषणो !
जाओ...
कि स्वार्थ-साधना पर बैठी
उच्छृंखल ‘संज्ञाएँ’ 
बुला रही हैं तुम्हें!


जाओ...
कि वे तुम्हारे मुक्त साहचर्य की
आकांक्षिणी हैं।


जाओ...
कि यश-कामना की शब्दारती
उतारनी है तुम्हें!


जाओ...
कि आत्म-मुग्ध सर्जना
निजाभिषेक को आतुर है।


जाओ...
कि ‘अहम्’ अपनी तुष्टि की चाह में
मृग-सा विकल है।


जाओ...
कि क्रिया-पदों की पंगत में
विशेषादर मिलेगा तुम्हें!


जाओ...
कि उभयपक्षीय लाभ का सौदा
क्रियान्वयन को लालायित है।


जाओ...
कि साठोत्तरी अक्षर-यज्ञ की
समिधा बनना है तुम्हें!


जाओ...
कि एक ‘अधूरी’ पांडुलिपि को
तुम्हारी ‘अधीर’ प्रतीक्षा है।


ऐ आवारा विशेषणो... !
जाओ...


जाओ... कि स्वार्थ-साधना पर बैठी
उच्छृंखल ‘संज्ञाएँ’
बुला रही हैं तुम्हें!
                              -जितेन्द्र ‘जौहर’
___________________________________________ 
(1). उपर्युक्त कविता पर गुण-दोष विवेचनपूर्ण  टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है! 
(2). काव्य सृजनधर्मियों के लिए एक आवश्यक सूचना--
हमारी पत्रिकाओं ‘अभिनव प्रयास’ (अलीगढ़)  एवं ‘प्रेरणा’ (शाहजहाँपुर) के लिए काव्य की प्रत्येक विधा की उत्कृष्ट एवं प्रकाशन-योग्य रचनाएँ सादर आमंत्रित हैं।