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साथी-संगम

Friday, May 13, 2011

रुबाई-३ :

काटे हैं शबो-रोज़ वो काले कैसे?
सीने में छिपा दर्द निकाले कैसे?
मत पूछिए विधवा ने भरी दुनिया में,
पाले हैं भला बच्चे तो पाले कैसे?
                                                               -जितेन्द्र ‘जौहर’
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शब्दार्थ : शबो-रोज़ = रात और दिन (दिन-रात)

Monday, May 2, 2011

रुबाई-२



जो सच है करो उसकी इबादत यारो!
औरों के हो जज़्बात की इज्ज़त यारो!
इंसान को इंसान अगर बनना है,
तो समझे वो जीवन की हक़ीक़त यारो!
                                    -जितेन्द्र ‘जौहर’

Friday, April 15, 2011

रुबाई-१ :



मौसम की हवाओं का असर होता है।
हर दिल पे फ़िज़ाओं का असर होता है।
यह बात कोई माने न माने लेकिन,
जीवन में दुआओं का असर होता है।
                                               

मित्रो! लम्बे अंतराल के बाद पुनः उपस्थित हूँ आपके बीच, उपर्युक्त सद्यस्क ‘रुबाई’ के साथ...

                                                                         -जितेन्द्र ‘जौहर’

Tuesday, November 16, 2010

क्षणिकाएँ

-1-
दूरियाँ 

मज़दूर,
मजबूर है...!

मालिक,
मग़रूर है...!

दौलत के नशे में चूर है!
इसीलिए
मज़दूर से दूर है!


-2-
नशा

दौलत में-
‘शान’ नहीं,
‘नशा’ है...!

‘नशा’ में-
‘नाश’ है...!

नशेड़ी,
एक चलायमान
लाश है...!


 -जितेन्द्र ‘जौहर’ 

Saturday, October 30, 2010

साहित्य में ‘परस्पर यश-गान’ पर...

     हमारा यह दौर... विशेषणों की अपव्ययिता का दौर है। साहित्य में तो कितने ही कविगण ‘उभयपक्षीय लाभ’ के मौन समझौते के तहत एक-दूसरे को ‘कालिदास-भवभूति’ कहकर आत्म-मुग्धता के आनन्द-लोक में उन्मुक्त विचरण करते दिख रहे हैं। आज ये विशेषण  इतने ‘आवारा’ हो गये हैं कि तमाम ब्लॉगों पर ‘विकलांग’ और ‘अल्लम-गल्लम’ कविताओं की भी शब्दारती उतारते दिख जाते हैं।


     यहाँ ‘संज्ञाएँ’ शब्द का प्रयोग सांकेतिक है; यह संकेत उन स्व-घोषित ‘महाकवियों’ को केन्द्र में रखकर रचा गया है जो स्वयं को साहित्य की किसी अंतरिक्षीय कक्षा (Orbit) में स्थापित करने / करवाने के लिए स्व-प्रायोजित ‘महा अभिनंदन-ग्रंथ’ तक प्रकाशित करवा डालते हैं, वह भी अपने ख़र्चे पर... हाऽऽ  हाऽऽ  हाऽऽ...! 
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आवारा विशेषणो !
जाओ...
कि स्वार्थ-साधना पर बैठी
उच्छृंखल ‘संज्ञाएँ’ 
बुला रही हैं तुम्हें!


जाओ...
कि वे तुम्हारे मुक्त साहचर्य की
आकांक्षिणी हैं।


जाओ...
कि यश-कामना की शब्दारती
उतारनी है तुम्हें!


जाओ...
कि आत्म-मुग्ध सर्जना
निजाभिषेक को आतुर है।


जाओ...
कि ‘अहम्’ अपनी तुष्टि की चाह में
मृग-सा विकल है।


जाओ...
कि क्रिया-पदों की पंगत में
विशेषादर मिलेगा तुम्हें!


जाओ...
कि उभयपक्षीय लाभ का सौदा
क्रियान्वयन को लालायित है।


जाओ...
कि साठोत्तरी अक्षर-यज्ञ की
समिधा बनना है तुम्हें!


जाओ...
कि एक ‘अधूरी’ पांडुलिपि को
तुम्हारी ‘अधीर’ प्रतीक्षा है।


ऐ आवारा विशेषणो... !
जाओ...


जाओ... कि स्वार्थ-साधना पर बैठी
उच्छृंखल ‘संज्ञाएँ’
बुला रही हैं तुम्हें!
                              -जितेन्द्र ‘जौहर’
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(1). उपर्युक्त कविता पर गुण-दोष विवेचनपूर्ण  टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है! 
(2). काव्य सृजनधर्मियों के लिए एक आवश्यक सूचना--
हमारी पत्रिकाओं ‘अभिनव प्रयास’ (अलीगढ़)  एवं ‘प्रेरणा’ (शाहजहाँपुर) के लिए काव्य की प्रत्येक विधा की उत्कृष्ट एवं प्रकाशन-योग्य रचनाएँ सादर आमंत्रित हैं। 

Saturday, October 23, 2010

‘ईर्ष्या’ और उसकी की दो बहनें : Jealousy and Its Two Sisters


डॉ. दिव्या श्रीवास्तव जी अपने ब्लॉग पर  इस बार ‘ईर्ष्या’ विषय को लेकर सामने आयीं हैं। यहाँ मैं उनकी विचार-धारा में एक नया आयाम जोड़ने का अदना-सा प्रयास कर रहा हूँ। शायद आपको पसंद आये। आपकी सार्थक  टिप्पणियों की राह निहारूँगा। आपसे उम्मीद तो यह करता हूँ कि आप भी इस प्रकरण पर यहाँ कुछ जोड़कर विषय को विस्तार देंगे! तो लीजिए, हुज़ूर...प्रस्तुत हूँ अपने विचारों के साथ:
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‘ईर्ष्या’ शब्द पर विस्तृत प्रकाश डालना पिष्टपेषण करने जैसा होगा ? ऐसे में,  मैं  सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगा कि-
"Jealousy is an awkward homage which inferiority renders to merit." 

 Inferiority और Merit  के वास्तविक अर्थ से तो हम सभी बख़ूबी वाक़िफ़ हैं। लेकिन यहाँ इनका प्रयोग सांकेतिक है... यहाँ ये शब्द व्यक्तियों के लिए प्रयोग किये गये हैं। इन दोनों शब्दों का जो इंगितार्थ है, उसके आधार पर एवं इनके लक्षणों को ध्यान में रखते हुए मैं इन्हें क्रमशः ‘तुच्छ’ और ‘उच्च’ कहना चाहूँगा।

कितना बेहतर होता, यदि Inferiority (तुच्छता) अपना समय, चिंतन और ऊर्जा किसी दूसरे की Merit (उच्चता)  का उपहास उड़ाने के बजाय अपनी ‘तुच्छता’ को ‘उच्चता’  में परिवर्तित करने में लगाती। आशय यही कि ‘तुच्छता’ निरर्थक निंदा करने में अपने समय-चिंतन-ऊर्जा का जो अपव्यय करती घूमती रहती है, वह सृजनात्मक न होकर, विनाशक है, बल्कि कहना चाहिए कि ‘आत्म-विनाशक’।

यदि ‘तुच्छता’ अपने चिंतन की दिशा बदलते हुए,  दृष्टि का मूल कोण बदलते हुए अपने अंदर प्रतिस्पर्द्धी भाव को जगा ले और अपनी योग्यता एवं शक्ति के विस्तार की दिशा में सक्रिय हो जाए तो.... निश्चित रूप से एक-न-एक दिन ‘ईर्ष्या’ स्वयं भी ईर्ष्या की पात्र बन सकती है!

ईर्ष्या से बचने के जितने भी ज्ञात उपाय हैं, उनमें से मुझे सर्वोत्तम उपाय यही लगता है कि यदि हम दूसरों के सद्‌गुणों, विशेषताओं, योग्यताओं आदि की मुक्त हृदय से  प्रशंसा करना सीख लें, तो हम अपने मन में  ‘ईर्ष्या-भावना’ के उत्पन्न होने का मार्ग काफी हद तक अवरुद्ध कर सकते हैं।

अरे, ये क्या...ऽऽऽ? मैं तो ‘ईर्ष्या’ के बिन्दु पर ही अटककर रह गया। चलिए...कोई बात नहीं, अब आ जाते हैं उस नये आयाम पर जिसका मैंने लेखारम्भ में उल्लेख किया है।  

‘ईर्ष्या’ की दो बहनें और भी हैं; ये दोनों बहनें मनुष्य के लिए कम हानिकारक नहीं। इनका हानिकारक होना स्वाभाविक ही तो है, आख़िर बहनें किसकी हैं...‘ईर्ष्या’ की ही न? तो फिरऽऽऽ...! इनके स्वभाव में क्रियात्मक / व्यवहारात्मक नकरात्मकता (Behavioral Negativity) का आना स्वाभाविक ही है!

शास्त्रों में इनका (जिन्हें मैं प्रायः ‘जेलसी एण्ड सिस्टर्स’  कहता हूँ) सानिध्य त्याज्य बताया गया है। शास्त्रादेश को अनदेखा करके जो व्यक्ति इनकी संगत अपनाता है, उसके व्यक्तित्व में दोष तो उत्पन्न होता ही है...साथ ही वह अपना नुकसान भी करता है। कैसे...?

इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘ईर्ष्यालु’ व्यक्ति अपने किसी लक्षित इंसान को कितना नुकसान पहुँचा पाता है, यह उन परिस्थितियों पर निर्भर करता है जिनमें वह अपने ‘लक्ष्य’ पर निंदादि माध्यम से क्रियाशील हुआ है या यूँ कहें कि प्रहार करने चला है! वह कितना सफल होगा, यह तो तत्कालीन परिस्थितियाँ ही बताएँगी। ...लेकिन इतना तो तय है कि वह सबसे पहला नुकसान स्वयं का ही करता है। इस बात को मैंने कभी अपनी  अंग्रेज़ी ग़ज़ल के एक शे’र में कहने की कोशिश की थी। प्रसंगतः वह शे’र यहाँ आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है :

Grudge is a 'corpion which stings-
Its bearer, seldom others bite. 

ख़ैर...।

‘ईर्ष्या’ की दो बहनों में से एक का नाम है- ‘असूया’।‘ईर्ष्या’ की सौतेली बहन है यह; बड़ी दुष्टा है। ढंग से पहचान लीजिए इसे! ‘छिद्रान्वेषण’  इसकी आदत मे शामिल है! सरल एवं मुहावरेदार भाषा में कहें तो... ‘दूसरों के फटे में टाँग अड़ाती है यह’! बड़ी काग-दृष्टि होती है इसके पास!  दूसरों के श्रेष्ठ गुण में भी बड़ी कलात्मकता व चतुराई से दोष-दर्शन कर लेती है। संस्कृत आचार्यॊं ने इसे कुछ यूँ परिभाषित किया है-
"असूया परगुणेषु दोषनिष्करणं।" 

स्मरण रखने की सुविधा के हिसाब से संक्षेप में कह सकते हैं कि-
दूसरों के गुण न सह पाना ‘ईर्ष्या’ है, जबकि दूसरों के गुण को अवगुण- दुर्गुण बताना ‘असूया’ है। 

‘ईर्ष्या’ की दूसरी बहन है- ‘पिशुनता’। यह ‘असूया’ की सहोदरा कहलाती है। जी हाँ...सहोदरा, यानी समान ‘उदर’ अर्थात्‌ एक ही ‘पेट’ से उत्पन्न! यह भी कम शातिर नहीं..., बल्कि ‘असूया’ से एक क़दम आगे ही है। दूसरे का ‘अज्ञात दोष’ प्रकट करना इसकी मूल मनोवृत्ति है। इसकी प्रभाव-परिधि में आकर व्यक्ति अपने विरोधी के ऐसे-ऐसे अवगुण / दुर्गुण गिनाने लगता है जिनके बारे में पहले कभी सुना या जाना नहीं गया होता है। यह गुप्त रूप से गहरा प्रहार करने के लिए सदैव तत्पर रहती है। चुग़लखोरी और मिथ्या-निंदा के पथ की पथिक होती है यह। संस्कृत में इसका अर्थ कुछ यूँ बताया गया है-
"पैशुन्यं परदूषणम्‌।"  अर्थात्‌... ‘पर-दोष’ यानी पराये दोषों की चुग़ली करना ‘पिशुनता’ है।
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आपको यह वर्णन / विवेचन कैसा लगा?  कृपया इस पर अपनी बहुमूल्य राय देना न भूलें। बेहतर हो कि आप खुलकर अपने विचार जोड़कर इस लेख को और भी अधिक ज्ञानवर्द्धक एवं उपयोगी बनाएँ...  तथास्तु!

Wednesday, October 20, 2010

आत्मा : हिदू बनाम मुस्लिम

आज मैं  ब्लॉग-जगत्‌ में चिंतन-मनन के बीज-कणों को तलाशता हुआ डॉ. दिव्या श्रीवास्तव  (थाइलैण्ड) के   ब्लॉग  http://zealzen.blogspot.com/2010/10/our-soul.html  पर जा पहुँचा। दिव्या जी ने अपनी एक ताज़ा पोस्ट में ‘आत्मा’ विषयक अनेक रोचक प्रश्न उठाये हैं। मेरे पहुँचने तक वहाँ 92 प्रतिक्रियाएँ समाने आ चुकी थीं... जिनमें एक-से-बढ़कर-एक विचार भरे पड़े थे। मेरी यात्रा सुखद रही। जो प्रश्न अक्सर मेरे मस्तिष्क में उभरकर चिंतन को कुरेदते रहे हैं, आज पुनः उठ खड़े हुए।  दिव्या जी ने ‘आत्मा’ जैसे ‘दिव्य’ विषय पर अनेक विचार-बिन्दु सामने रखे हैं जिनमें से  उनके निम्नांकित प्रश्न पर मैं अपनी विचार-माला जोड़ना चाहूँगा (यद्यपि मैं इस विषय का न तो कोई आधिकारिक विद्वान हूँ और न ही कोई विशिष्ट अध्येता) :

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"क्या आत्माओं का भी कोई धर्म होता है ? क्या एक हिन्दू आत्मा मुस्लिम परिवार में जन्म ले सकती है?" 
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        आत्मा को ‘ऊर्जा’ मानते ही इस प्रश्न का समाधान स्वयमेव हो जाता है...आइए, हम एक बार  विचार करके देखते हैं-

 जिस प्रकार ऊर्जा अनेक वैद्युत उपकरणों में प्रविष्ट होकर उन्हें संचालित/ गतिमान/ प्रकाशमान कर देती है, उसी प्रकार ‘आत्मा’ हमारे देह-रूपी उपकरण को संचालित करती है।

अब, ऊर्जा ‘फिलिप्स’ के उपकरण में प्रविष्ट हो या ‘क्रॉम्प्टन’ के उपकरण में...या फिर किसी अन्य ब्राण्ड के किसी यंत्र में, इससे ऊर्जा का धर्म तो नहीं बदल जाता! ‘फिलिप्स’ ब्राण्ड  के उपकरण/ यंत्र में जाकर वह ‘फिलिप्सीय ऊर्जा’ नहीं कहलाएगी...और न ही ‘क्रॉम्प्टन’ के बल्ब में घुसकर ‘क्रॉम्प्टनीय ऊर्जा’। ऊर्जा तो सिर्फ़ ऊर्जा है।

ठीक उसी प्रकार आत्मा किसी ‘हिन्दू’ देह में प्रविष्ट हो या  किसी ‘मुस्लिम’ शरीर में...इससे आत्मा के साथ ‘हिन्दू-मुस्लिम’ नाम्नी विशेषण नहीं जोड़े जा सकते हैं। आत्मा तो सिर्फ़ आत्मा है!

अब थोड़ा व्यापक दृष्टि से देखिए-
‘हिन्दू’ और ‘मुस्लिम’ उस  परमसृष्टा की सृजन-सोच के हिस्से नहीं हैं; उसने तो सिर्फ़ ‘मनुष्य’ को गढ़ा है, ‘हिन्दू-मुस्लिम’ आदि को नहीं। ये जो ‘हिन्दू-मुस्लिम’ आदि हैं, सब  मनुष्य की निर्मितियाँ हैं। राष्ट्रकवि दिनकर जी ने ‘रश्मिरथी’ के द्वितीय सर्ग में  लिखा है कि :

'मैं कहता हूँ, अगर विधाता नर को मुठ्ठी में भरकर,
कहीं छींट दें ब्रह्मलोक से ही नीचे भूमण्डल पर,
तो भी विविध जातियों में ही मनुज यहाँ आ सकता है;
नीचे हैं क्यारियाँ बनीं, तो बीज कहाँ जा सकता है?


इस प्रकार हिन्दू-मुस्लिम रूपी क्यारियाँ पूर्णतः मानव-निर्मित हैं। मेरी राय में, जिस प्रकार किसी एक ‘क्यारी’ का  ‘पौधा’ किसी दूसरी ‘क्यारी’ में जाकर पुष्पित-पल्लवित हो सकता है, ठीक उसी प्रकार एक जन्म में हिन्दू परिवार में जन्मने वाले व्यक्ति की आत्मा किसी अगले जन्म में मुस्लिम-परिवार में देह-रूप धारण कर सकती है। ...Contd 


(शेष अगली किस्त में)